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लालू-राबड़ी जेड प्लस सुरक्षा विवाद पर गरमाई बिहार की राजनीति, जदयू मंत्री अशोक चौधरी का तीखा बयान

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बिहार में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा व आवास को लेकर विवाद गहराया। जेड प्लस सुरक्षा में बदलाव के बाद राजद और सरकार आमने-सामने हैं, जदयू मंत्री अशोक चौधरी ने लालू यादव के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

पटना/आलम की खबर:पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड आवास और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री Lalu Prasad Yadav तथा Rabri Devi की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर राज्य की राजनीति गरमा गई है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा वीआईपी सुरक्षा की समीक्षा के बाद दोनों नेताओं की जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था में किए गए बदलावों को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इस पूरे मामले ने अब राजनीतिक टकराव का रूप ले लिया है, जहां एक ओर राजद सरकार पर निशाना साध रही है, वहीं दूसरी ओर जदयू के नेता खुलकर पलटवार कर रहे हैं।

इस विवाद की शुरुआत तब और तेज हो गई जब Lalu Prasad Yadav ने मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। लालू यादव ने कहा कि “सब कुछ नीतीश कुमार ही करवा रहे हैं,” जिसके बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। उनके इस बयान को लेकर जदयू खेमे से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है और इसे बेबुनियाद और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया जा रहा है।

जदयू के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार के मंत्री Ashok Chaudhary ने लालू यादव के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लालू प्रसाद यादव मानसिक रूप से असंतुलित बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब नीतीश कुमार सत्ता में थे, तब भी लालू परिवार राबड़ी आवास में रह रहा था और अब भी सरकार द्वारा उन्हें वैकल्पिक और व्यवस्थित आवास व सुरक्षा दी गई है। ऐसे में यह कहना कि सभी निर्णय मुख्यमंत्री द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिए जा रहे हैं, पूरी तरह गलत और राजनीति से प्रेरित है।

अशोक चौधरी ने आगे कहा कि सुरक्षा और आवास से जुड़े सभी निर्णय किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं बल्कि सुरक्षा समिति और पुलिस प्रशासन द्वारा तय किए जाते हैं। इसमें पूरी तरह तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नेता की सुरक्षा में बदलाव केवल खतरे के आकलन और निर्धारित प्रोटोकॉल के आधार पर किया जाता है, न कि राजनीतिक दबाव या व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर।

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने हाल ही में वीआईपी सुरक्षा की व्यापक समीक्षा की थी, जिसके बाद Lalu Prasad Yadav और Rabri Devi की जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था में कुछ बदलाव किए गए। इस बदलाव के बाद दोनों नेताओं की सुरक्षा संरचना को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए और इसे राजनीतिक निर्णय बताया। हालांकि प्रशासन का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया सुरक्षा मानकों और खतरे के आकलन के आधार पर की गई है।

इसी बदलाव के बाद एक और विवाद तब खड़ा हो गया जब दोनों नेताओं ने अपने आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को वापस भेज दिया। इसके बाद राजद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल ली और 10 सर्कुलर रोड के बाहर भीड़ और राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गईं। इससे पूरे मामले ने राजनीतिक रंग और गहरा कर दिया।

इस बीच बिहार पुलिस मुख्यालय ने भी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि दोनों नेताओं को बिहार विशेष सुरक्षा दल अधिनियम-2010 के तहत पूरी सुरक्षा दी जा रही है। पुलिस के अनुसार, उन्हें अंगरक्षक, आवास गार्ड, स्कॉट गार्ड, पायलट वाहन और बुलेट रेसिस्टेंट (BR) कार उपलब्ध कराई गई है। साथ ही खतरे के आकलन के आधार पर स्पेशल ब्रांच के सुरक्षाकर्मी सादे लिबास में भी तैनात किए गए हैं ताकि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनी रहे।

पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुरक्षा में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गई है और सभी व्यवस्थाएं निर्धारित मानकों के अनुसार ही लागू हैं। इसके बावजूद राजनीतिक बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और यह मुद्दा लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल सुरक्षा व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ता टकराव भी एक बड़ा कारण है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक रूप ले सकता है।

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बिहार में वीआईपी सुरक्षा समीक्षा के बाद बढ़ा विवाद | 

लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठा विवाद एक बार फिर यह दिखाता है कि बिहार की राजनीति में प्रशासनिक फैसले भी कितनी तेजी से राजनीतिक बहस का विषय बन जाते हैं। सुरक्षा समीक्षा एक नियमित प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य केवल वीआईपी सुरक्षा को समय-समय पर खतरे के आकलन के अनुसार अपडेट करना होता है।

लेकिन इस पूरे मामले में जिस तरह से बयानबाजी तेज हुई है, उसने प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक रंग दे दिया है। एक ओर जहां सरकार और पुलिस यह दावा कर रही है कि सभी फैसले नियमों के तहत लिए गए हैं, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है।

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन जब तथ्यात्मक आधार कमजोर हो जाता है, तो विवाद केवल राजनीतिक टकराव का माध्यम बन जाता है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव डालती है, बल्कि जनता के बीच भ्रम भी पैदा करती है।

इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी से बचना चाहिए और संस्थागत प्रक्रियाओं पर भरोसा करना ही बेहतर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण है।

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